राजा चित्रकेतु के पास सब कुछ था, केवल संतान नहीं। बहुत प्रतीक्षा के बाद मिला पुत्र जब चल बसा, तब दो ऋषियों ने ऐसा प्रश्न पूछा जिसने शोक को जागरण में बदल दिया—असंख्य जन्मों में वास्तव में कौन किसका है?
चित्रकेतु विशाल राज्य के स्वामी और अनेक रानियों के पति थे, फिर भी महल उन्हें सूना लगता था। ऋषि अंगिरा ने उनके छिपे दुःख को देखकर पुत्र का आशीर्वाद दिया, साथ ही कहा कि यह बालक हर्ष और शोक दोनों का कारण बनेगा।
राजकुमार के जन्म से उत्सव छा गया। पर मुख्य रानी का सुख दूसरी रानियों में ईर्ष्या जगा गया। कटुता में उन्होंने बालक को विष दे दिया। माता ने उसे निश्चल पाया; राजा शव के पास गिर पड़े। पुत्र के बिना संसार आगे बढ़ सकता है—यह कल्पना भी असह्य थी।
अंत्येष्टि के समय प्रश्न
अंगिरा नारद मुनि के साथ लौटे। उन्होंने माता-पिता के दुःख को छोटा नहीं कहा। उन्होंने उसकी गहराई में देखने को कहा। मनुष्य सराय में मिले यात्रियों जैसे हैं। कर्म के अनुसार आत्माएँ माता-पिता, संतान, मित्र और अपरिचित बनती हैं; समय मार्ग बदलता है तो वे अलग हो जाती हैं।
नारद ने दिवंगत जीवात्मा को कुछ क्षण बोलने के लिए बुलाया। शांत सभा में बालक ने पूछा, “किस जन्म में ये मेरे माता-पिता थे?” वह असंख्य देहों और संबंधों से गुजर चुका था। किस थोड़े समय की भेंट को स्थायी कहे?
यह उत्तर कठोरता नहीं था, बल्कि व्यापक प्रेम था। आत्मा नित्य है; सांसारिक भूमिकाएँ इसलिए अनमोल हैं क्योंकि उन पर सदा अधिकार नहीं रखा जा सकता।
बालक फिर चला गया। चित्रकेतु ने अंतिम संस्कार किया, पर अब शोक की जंजीरें ढीली थीं। ऋषियों के मार्गदर्शन में उन्होंने साधना की और अंततः भगवान का दर्शन पाया।
प्रेम तब बुद्धिमान होता है जब “तुम सदा मेरे हो” के स्थान पर कहता है—“जितना समय मिला है, मैं तुम्हारी अच्छी सेवा करूँ।”
कथा का संदेश
भागवत शोकग्रस्त मनुष्य को संवेदनाहीन नहीं बनाता। चित्रकेतु रोते हैं। उसी शोक में ज्ञान मिलता है: मृत्यु एक भूमिका समाप्त करती है, आत्मा को नहीं। आध्यात्मिक ज्ञान स्नेह मिटाता नहीं; वह स्नेह को इस असंभव माँग से मुक्त करता है कि परिवर्तन कभी न आए।
शास्त्रीय आधार: श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध 6, अध्याय 14–16। यह मौलिक साहित्यिक पुनर्कथन है।

