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Bhagwat Mahapuran

अवन्ति ब्राह्मण का सहनशीलता-गीत

एक धनी ब्राह्मण ने सब खो दिया और लोगों के उपहास का पात्र बना। संसार को स्थायी शत्रु बनाने के बजाय उसने गीत रचा—मेरे भीतर की दशा पर किसी अपरिचित या परिस्थिति से अधिक मेरे अपने मन का प्रभाव है।

अवन्ति में एक समृद्ध पर कंजूस ब्राह्मण रहता था। धन बचाने के लिए परिवार, अतिथि, पूर्वज और धर्म की उपेक्षा करता। उसका धन किसी के काम नहीं आया—स्वयं उसके भी नहीं।

फिर भाग्य बदला। कुछ धन संबंधियों ने लिया, कुछ चोरों ने, कुछ शासकों ने और शेष समय ने नष्ट कर दिया। जिन संबंधों की कीमत पर खजाना बचाया था, वही खजाना चला गया।

पहले वह रोया। फिर समझा: धन रहते हुए भय और जाते हुए पीड़ा दे गया। उसने दण्ड और भिक्षापात्र लेकर परिव्राजक जीवन चुना।

अपमान के बीच गीत

लोगों ने परिवर्तन का सम्मान नहीं किया। किसी ने उपहास किया, थूका, दण्ड छीना और गालियाँ दीं। पूर्व कंजूस के सामने नई परीक्षा थी—अपमान को ही अपनी पहचान बना लेना।

उसने मन को देखा और गाया। ये लोग मेरे सुख-दुःख के अंतिम कारण नहीं। शरीर, ग्रह, कर्म और काल की भूमिका है, पर मन की आसक्ति और व्याख्या से दुःख “मेरा” बनता है। इसलिए मन को परम भगवान की भक्ति से प्रशिक्षित करना होगा।

यह क्रूरता की अनुमति या अन्याय का इनकार नहीं था। वह अपमान करने वालों को अपनी आंतरिक दिशा का स्वामी बनाने से मना कर रहा था। गलत को सही कहे बिना सह सकता था; घृणा के बिना उत्तर और स्थायी बोझ के बिना आगे बढ़ सकता था।

हम यह न चुन सकें कि हमारे पास क्या आता है, फिर भी यह साधना कर सकते हैं कि भीतर सिंहासन किसे मिलेगा।

आत्म-दोष के बिना जिम्मेदारी

इस गीत का अर्थ यह नहीं कि पीड़ित हर घटना का कारण है। इसका अर्थ है कि मन हर घटना को अपरिवर्तनीय पहचान न बनाए। ब्राह्मण पूर्व लोभ स्वीकारता, वर्तमान का सामना करता और ध्यान भगवान की ओर रखता है। सहनशीलता अन्याय का मौन समर्थन नहीं, विवेक-निर्देशित शक्ति बनती है।

शास्त्रीय आधार: श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध 11, अध्याय 23। यह मौलिक साहित्यिक पुनर्कथन है।

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