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Bhagwat Mahapuran

गजेंद्र मोक्ष: गहराइयों से उठाया गया कमल

जब गजराज की अपार शक्ति भी उन्हें बचा न सकी, तब स्मृति की गहराइयों से एक प्राचीन प्रार्थना जाग उठी।

एक समय त्रिकूट नाम का पर्वत था। उसकी तीन दीप्तिमान चोटियाँ मानो आकाश को छूती थीं और उसके चारों ओर दूध के समान उज्ज्वल समुद्र फैला था। हरे ढलानों पर झरने चाँदी की धाराओं जैसे बहते थे। फूलों से लदे वृक्ष गुफाओं के ऊपर झुकते थे और हवा में पक्षियों, भौंरों तथा दिव्य अतिथियों का संगीत घुला रहता था। पर्वत की तलहटी में एक निर्मल सरोवर था, इतना स्वच्छ कि नीले जल की गहराई में उतरते कमलों के डंठल भी दिखाई देते थे।

इसी सरोवर की ओर विशाल हाथी-समूह के स्वामी गजेंद्र आए।

वे अपने झुंड के आगे ऐसे चलते थे जैसे कोई पर्वत स्वयं चल पड़ा हो। जंगल से गुजरते समय बाँस उनके लिए झुक जाते, उनकी गर्जना पर पूरी घाटी उत्तर देती। छोटे हाथी उनके पीछे निश्चिंत चलते, माताएँ उनकी चौकसी पर भरोसा करतीं और सिंह भी दूरी बनाए रखते। शक्ति ही गजेंद्र की भाषा थी, और संसार ने हमेशा उस भाषा को समझा था।

एक राजा जल में उतरता है

एक सुबह वन पर प्रचंड गर्मी छाई हुई थी। झुंड बहुत दूर चल चुका था और शावक थकने लगे थे। तभी गजेंद्र को भीगे कमलों की सुगंध मिली और सरकंडों के बीच बहते जल की ध्वनि सुनाई दी। उन्होंने गति बढ़ा दी। अपने विशाल मस्तक से शाखाएँ हटाते हुए वे सबको सरोवर तक ले आए।

जल का पहला स्पर्श शीतल राहत जैसा था। गजेंद्र भीतर तक उतरे, सूँड भरकर पानी पिया और अपनी पीठ पर चाँदी-सी धाराएँ उछालीं। आनंदित स्वर करते हुए पूरा झुंड पीछे आ गया। बच्चे बड़ों के बीच पानी उछालने लगे और कमल-पराग सतह पर तैरने लगा। कुछ देर के लिए उस सरोवर में केवल उल्लास और समृद्धि थी।

त्रिकूट पर्वत के नीचे गजेंद्र अपने हाथियों के झुंड को शांत कमल-सरोवर में ले जाते हुए
परीक्षा से पहले: त्रिकूट की तीन चोटियों के नीचे कमल-सरोवर में उतरता हाथियों का झुंड। यह चित्र विशेष रूप से इस कथा के लिए बनाया गया है।

पर उस सरोवर में कोई और भी रहता था।

अँधेरे जल के भीतर से एक मगरमच्छ बिजली की तरह उठा और उसने गजेंद्र का पैर अपने जबड़ों में जकड़ लिया।

गजराज चिंघाड़े। मानो पर्वत भी उनके साथ काँप उठा। उन्होंने बाकी पैरों को सरोवर की तली में जमाकर पूरी शक्ति से खींचा। चारों ओर जल फट पड़ा। मगरमच्छ ने उन्हें वापस गहराई की ओर खींचा—उस जल में, जो मगरमच्छ का घर था और हाथी की शक्ति को क्षीण कर रहा था।

जब शक्ति अपनी सीमा से मिलती है

गजेंद्र का पूरा झुंड उनकी सहायता को दौड़ा। हाथियों ने अपनी सूँडें उनके शरीर के चारों ओर लपेटीं और उन्हें किनारे की ओर खींचने लगे। सबने इतना जोर लगाया कि नीचे की मिट्टी काली होकर घूमने लगी, पर मिली हुई हर इंच जमीन फिर छूट जाती। मगरमच्छ की पकड़ तनिक भी ढीली नहीं हुई।

यह संघर्ष साधारण सहनशक्ति की सीमा से बहुत आगे चला। जिन बलशाली पैरों ने वृक्ष तोड़े थे और हिंसक पशुओं को दूर भगाया था, गजेंद्र उसी शक्ति से लड़ते रहे। लेकिन गहरे जल में शक्ति के नियम बदल जाते हैं। मगरमच्छ स्थिर और सबल होता गया; गजेंद्र थकते गए।

अंततः झुंड के पास करने को कुछ नहीं बचा। वे किनारे पर खड़े होकर पुकारते रहे—प्रेम से भरे, फिर भी असहाय।

गजेंद्र ने उनकी ओर देखा और पहली बार एक कठोर सत्य समझा: जो हमसे प्रेम करते हैं, वे हमारे साथ खड़े हो सकते हैं, हमें बचाने का भरसक प्रयत्न कर सकते हैं और हमारे लिए रो सकते हैं; फिर भी हमारे संघर्ष की सबसे गहरी जगह में उतर पाना उनके लिए संभव नहीं होता।

उनका शरीर साथ छोड़ रहा था। अहंकार के पास अब कोई आदेश नहीं बचा था। राजा, रक्षक और सबसे बलवान होने की उनकी पहचान मौन हो गई।

कभी-कभी पूर्ण शरणागति तभी आरंभ होती है, जब हर छोटा सहारा अपनी सीमा दिखा चुका होता है।

तभी भय और थकान के नीचे दबी हुई कोई पुरानी स्मृति जाग उठी।

इस जन्म से भी पुरानी आवाज

गजेंद्र हमेशा से हाथी नहीं थे। पूर्वजन्म में वे इंद्रद्युम्न नाम के राजा और भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। राज्य छोड़कर वे पर्वतों में तप और ध्यान करने लगे थे। एक दिन वे ध्यान में लीन और मौन-व्रत में स्थित थे। उसी समय वहाँ महर्षि अगस्त्य आए, पर समाधि में डूबे राजा उनका स्वागत न कर सके। ऋषि ने इसे अनादर समझा और कहा कि जड़-बुद्धि हाथी की भाँति मौन रहने वाला यह राजा अगले जन्म में हाथी बनेगा।

देह बदल गई थी। पुराना ज्ञान प्रवृत्तियों, बल और बीते वर्षों के नीचे छिप गया था। किंतु भक्ति ने हृदय में एक बीज छोड़ दिया था।

अब, जब बाकी सब कुछ उनसे छिन गया, वही बीज अंकुरित हुआ।

ॐ नमो भगवते तस्मै
यत एतच्चिदात्मकम्।
पुरुषायादिबीजाय
परेशायाभिधीमहि॥

“उस परम प्रभु को नमस्कार है, जिनसे चेतना प्रकट होती है, जो समस्त सृष्टि के आदि कारण और सबके साक्षी हैं।” — श्रीमद्भागवत 8.3.2 का भावार्थ

गजेंद्र ने केवल शत्रु को पराजित करने की शक्ति नहीं माँगी। उनकी प्रार्थना सरोवर की सीमा से परे फैल गई। उन्होंने उस परम सत्ता को पुकारा जो नाम और रूप से पहले भी विद्यमान है, संसारों की उत्पत्ति और लय के बाद भी रहती है, और हर हृदय में साक्षी बनकर स्थित है। उन्होंने केवल मगरमच्छ से मुक्ति नहीं माँगी; उस अज्ञान से मुक्ति माँगी जो उन्हें यह मानने पर विवश करता था कि वे संकट में फँसा हुआ मात्र एक शरीर हैं।

अपनी अंतिम शक्ति जुटाकर उन्होंने एक कमल तोड़ा और उसे सूँड में ऊँचा उठा लिया।

“नारायण,” उन्होंने पुकारा, “जगत के स्वामी, मैं आपकी शरण में हूँ।”

अर्पण सरल था। समर्पण संपूर्ण था।

कृपा आकाश पार करती है

भगवान विष्णु ने पुकार सुन ली।

वे गरुड़ पर आरूढ़ होकर तुरंत चले आए। आकाश में उनका तेज फैल गया और उनके हाथ में जागृत काल के समान घूमने वाला सुदर्शन चक्र था। देवगण देखते रहे जब प्रभु सरोवर तक पहुँचे। अर्धचेतन और आधे जल में डूबे गजेंद्र अब भी कमल ऊपर उठाए हुए थे।

भगवान विष्णु नीचे उतरे, उन्होंने वह कमल स्वीकार किया और गजेंद्र को जल से बाहर खींच लिया। सुदर्शन चक्र चमका। उसी क्षण मगरमच्छ के जबड़े खुल गए और युगों जैसा लंबा संघर्ष समाप्त हो गया।

पर उस दिन एक नहीं, दो जीव मुक्त हुए।

वह मगरमच्छ पूर्वजन्म में हूहू नाम का गंधर्व था। एक बार विनोद करते हुए उसने स्नान कर रहे देवल ऋषि को परेशान किया था और ऋषि के शाप से मगरमच्छ बन गया था। भगवान के स्पर्श से हूहू को फिर अपना दिव्य स्वरूप प्राप्त हुआ और उसने कृतज्ञ होकर प्रणाम किया।

गजेंद्र भी पशु-देह की अज्ञानता और सीमाओं से मुक्त हो गए। श्रीमद्भागवत बताता है कि प्रभु के स्पर्श से उन्हें दिव्य स्वरूप मिला और वे परम धाम को चले गए।

आकाश से पुष्प बरसने लगे और दिव्य दुंदुभियाँ बज उठीं। किनारे पर खड़े हाथियों ने सरोवर को फिर से शांत होते देखा।

जो सरोवर गजेंद्र के विनाश का स्थान प्रतीत हुआ था, वही उनकी मुक्ति का द्वार बन गया।

गजेंद्र का कमल आज भी क्यों महत्त्वपूर्ण है

इस कथा का अर्थ यह नहीं कि प्रयास व्यर्थ है। गजेंद्र ने अपनी पूरी शक्ति से संघर्ष किया और उनके झुंड ने प्रेम में जो संभव था, वह सब किया। शिक्षा कहीं अधिक सूक्ष्म है: प्रयास का अपना उचित स्थान है, पर वही अंतिम आश्रय नहीं है।

हम सभी के जीवन में एक “सूखी भूमि” होती है, जहाँ हमारी क्षमताएँ काम करती हैं। हम योजना बनाना, समझाना, सहना, कमाना, सुधारना और रक्षा करना जानते हैं। फिर कभी जीवन हमें ऐसे गहरे जल में खींच लेता है जहाँ परिचित सामर्थ्य काम नहीं आता। बीमारी, शोक, भय, समय और अनिश्चितता किसी शक्तिशाली व्यक्ति को भी गजेंद्र जैसा असहाय अनुभव करा सकते हैं।

ऐसे क्षण में समर्पण हार मानना नहीं है; वह स्पष्टता है। यह पहचान है कि हमारा गहनतम अस्तित्व कभी केवल व्यक्तिगत शक्ति पर टिका ही नहीं था।

सूँड में उठा गजेंद्र का कमल भक्ति का शाश्वत प्रतीक बन गया। शरीर बँधा हो सकता है, मन थक सकता है और संसार कोई मार्ग न दिखाए—फिर भी हृदय प्रभु की ओर मुड़ सकता है। एक छोटा-सा निष्कपट अर्पण भी संपूर्ण आत्मा को अपने भीतर समेट सकता है।

और यह कथा आश्वस्त करती है कि प्रार्थना सरल हो तो भी कृपा देर नहीं करती।

साथ ले जाने योग्य तीन चिंतन

अपनी शक्ति का उपयोग करें

गजेंद्र ने प्रयत्न किए बिना समर्पण नहीं किया। भक्ति प्रयास को रोकती नहीं; वह प्रयास को सब कुछ नियंत्रित करने के भ्रम से मुक्त करती है।

अपने केंद्र को याद रखें

जब पद, प्रतिष्ठा और सहज प्रवृत्तियाँ मौन हुईं, तब प्रार्थना लौट आई। साधना हमारे भीतर ऐसी स्मृतियों के बीज बोती है जो संकट के समय जाग सकते हैं।

जो बचा है, वही अर्पित करें

गजेंद्र के पास न धन था, न विस्तृत अनुष्ठान—केवल एक कमल और निष्कपट हृदय। अर्पण का मूल्य उसकी वस्तु में नहीं, उसके समर्पण में होता है।

शास्त्रीय आधार

यह कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध में वर्णित घटनाओं पर आधारित एक मौलिक साहित्यिक पुनर्कथन है। इसमें मूल घटनाक्रम को सुरक्षित रखते हुए आज के पाठकों के लिए दृश्य-वर्णन, संवाद और चिंतन को नई भाषा दी गई है।


जल कितना भी गहरा हो, कमल फिर भी ऊपर उठ सकता है।

गजेंद्र की कथा हमें याद दिलाए कि अपनी शक्ति की अंतिम सीमा पर भी सच्चा स्मरण और पूर्ण शरणागति संभव है।

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