अड़तालीस दिनों तक अन्न और जल के बिना रहने के बाद राजा रंतिदेव को एक साधारण भोजन मिला। वे पहला ग्रास लेने ही वाले थे कि एक के बाद एक चार अतिथि आए—और करुणा ने उनसे सब कुछ माँग लिया।
कुछ राजाओं को उनके बनाए नगरों, विशाल सेनाओं या जीते हुए राज्यों के कारण याद किया जाता है। रंतिदेव को उस वस्तु के लिए याद किया जाता है जो उनकी दोनों हथेलियों में समा सकती थी—जल का अंतिम पात्र, जिसे उन्होंने स्वयं पीने के बजाय किसी और को दे दिया।
उनकी कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम स्कंध में कुछ ही श्लोकों में आती है, फिर भी वह हमारे सामने एक बहुत बड़ा प्रश्न रखती है: जब स्वयं जीवन संकट में हो, तब उदारता की सीमा कहाँ समाप्त होती है?
रंतिदेव के लिए वह सीमा उनके अपने शरीर पर समाप्त नहीं हुई।
वह राजा जिसने अपने लिए कुछ नहीं रखा
रंतिदेव भरतवंश में जन्मे थे। उनमें एक राजा का तेज था, पर राजसी सुखों से मोह नहीं था। भाग्य से जो कुछ प्राप्त होता, वे दूसरों में बाँट देते। अन्न उनके पास आता और भूखों तक पहुँच जाता। धन उनके हाथों में टिकने के बजाय जरूरतमंदों की ओर बहता। वे इसलिए दान नहीं करते थे कि उनके भंडार सदैव भरे रहते थे; वे इसलिए देते थे क्योंकि प्रत्येक जीव के भीतर उन्हें वही भगवान दिखाई देते थे।
धीरे-धीरे उनके पास लगभग कुछ नहीं बचा।
उनका परिवार भी उसी कठिन जीवन में सहभागी था। उन्होंने भूख, थकान और अनिश्चितता को निकट से जाना। फिर भी रंतिदेव ने अपनी करुणा को कभी हिसाब-किताब नहीं बनाया। उन्होंने यह नहीं पूछा कि सामने वाला सहायता का अधिकारी है या नहीं, दान से उनकी कीर्ति बढ़ेगी या नहीं, अथवा कल के लिए पर्याप्त बचेगा या नहीं।
फिर भयंकर अभाव का समय आया।
एक दिन बिना भोजन के बीता, फिर दूसरा। दिन मिलकर सप्ताह बन गए। भागवत के अनुसार अड़तालीस दिन बीत गए और रंतिदेव तथा उनके परिवार को अन्न तो दूर, पीने का जल भी नहीं मिला।
उनचासवें दिन की सुबह तक उनके शरीर काँप रहे थे। मुँह सूख चुके थे और शक्ति लगभग समाप्त हो गई थी। तभी संयोग से घी, दूध और अन्न से बने कुछ पदार्थ तथा थोड़ा-सा जल प्राप्त हुआ।
वह कोई राजभोज नहीं था। भूख से व्याकुल परिवार के लिए वह स्वयं जीवन था।
पहला अतिथि
परिवार भोजन के सामने बैठा। मानो उनकी हर साँस उस पहले ग्रास की ओर झुक रही थी।
ठीक उसी क्षण द्वार पर एक ब्राह्मण अतिथि आए और उन्होंने भोजन माँगा।
रंतिदेव ने अतिथि को देखा, फिर भोजन को। उन्हें यह आगमन बाधा नहीं लगा। उन्होंने सामने खड़े व्यक्ति के भीतर हरि को देखा। श्रद्धा और सम्मान के साथ उन्होंने भोजन का एक भाग अतिथि को अर्पित कर दिया।
अतिथि भोजन करके चले गए।
परिवार ने बचा हुआ भोजन बाँटा। भाग छोटे हो चुके थे, फिर भी राहत अब बहुत पास थी। रंतिदेव ने अपना अन्न उठाया ही था कि दूसरा आगंतुक आ पहुँचा।
जब भूख फिर द्वार पर आई
यह व्यक्ति समाज के दूसरे वर्ग से था, पर भूख ने उस समय सभी भेद अर्थहीन कर दिए थे। उसने खाने के लिए कुछ माँगा।
रंतिदेव ने फिर उसके भीतर प्रभु का स्मरण किया और अपने लिए रखा भोजन उसे दे दिया।
वह व्यक्ति खाकर आगे चला गया।
अब बहुत थोड़ा अन्न बचा था। परिवार उसे ग्रहण कर पाता, उससे पहले तीसरा यात्री आया। उसके साथ कई भूखे कुत्ते थे। उनकी पसलियाँ दिखाई दे रही थीं और उनकी आँखें भोजन पर टिकी थीं।
यात्री ने निवेदन किया, “राजन्, मुझे और इन भूखे कुत्तों को कुछ भोजन दीजिए।”
रंतिदेव ने उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने बचा हुआ पूरा भोजन उस व्यक्ति और उसके पशुओं के सामने रख दिया। अपने द्वार पर उपस्थित हर जीवन का उन्होंने समान आदर किया।
वे सब खाकर तृप्त हुए। अब कोई ठोस भोजन नहीं बचा था।
केवल जल का एक छोटा पात्र शेष था।
अंतिम जल
रंतिदेव का कंठ जल रहा था। प्यास से उनका शरीर मूर्छा के निकट था। हाथों में रखा थोड़ा-सा जल केवल एक व्यक्ति के प्राण बचा सकता था। अन्न अब उनकी सहायता नहीं कर सकता था, किंतु यह अंतिम घूँट शायद उन्हें जीवित रख देता।
उन्होंने पात्र उठाया ही था कि चौथा यात्री लड़खड़ाता हुआ उनकी ओर आया।
वह मनुष्य अत्यंत थका और प्यासा था। वह उस समुदाय से था जिसे तत्कालीन समाज अपनी सीमाओं से बाहर रखता था। उसने जल पर अधिकार नहीं जताया; उसने केवल दया माँगी।
रंतिदेव ने उसके शब्दों में मात्र एक विनती नहीं सुनी। उन्होंने एक ऐसे जीव की पीड़ा सुनी जो जीवित रहना चाहता था।
उनके हाथ नीचे आ गए।
“मैं न अष्ट सिद्धियाँ चाहता हूँ, न पुनर्जन्म से अपनी मुक्ति। मैं समस्त जीवों के बीच रहकर उनके दुःख अपने ऊपर ले लूँ, ताकि वे पीड़ा से मुक्त हो सकें।”
यह श्रीमद्भागवत 9.21.12 में व्यक्त रंतिदेव की प्रार्थना का भाव है। उन्होंने किसी बड़े पुरस्कार की सौदेबाजी नहीं की। स्वर्ग पाने के लिए जल का दान नहीं किया। यदि दूसरे व्यक्ति के प्राण बच सकें, तो वे उसकी पीड़ा को स्वयं सहने के लिए तैयार थे।
उन्होंने अपना अंतिम जल उस यात्री को दे दिया।
यात्री ने जल पिया।
रंतिदेव स्वयं अन्न और जल से वंचित रहे, फिर भी भागवत कहता है कि वे भूख, प्यास, थकान, शोक और मोह से मुक्त हो गए। करुणा ने उनके शरीर को बलवान नहीं बनाया था; उसने उनकी चेतना को शरीर के भय से आगे पहुँचा दिया था।
जब अतिथियों के रूप बदल गए
तभी उस साधारण आश्रय का वातावरण बदल गया।
चारों अतिथियों ने अपने वास्तविक स्वरूप प्रकट किए। ब्राह्मण, दूसरा अतिथि, कुत्तों के साथ आया यात्री और प्यासा मनुष्य—ये सभी भगवान विष्णु की योगमाया से उपस्थित हुए दिव्य रूप थे। तीनों लोकों के अधिपति देवता रंतिदेव के सामने प्रकट हो गए।
वे इसलिए नहीं आए थे कि देवताओं को उनके भोजन की आवश्यकता थी। वे यह प्रकट करने आए थे कि जब रंतिदेव से सब कुछ छीन लिया जाएगा, तब भी उनके भीतर क्या शेष रहेगा।
कोई भौतिक वस्तु नहीं बची थी—पर उनकी भक्ति बची थी।
वे देवता धन, शक्ति और स्वर्ग के सभी सुख देने में समर्थ थे। रंतिदेव ने कुछ नहीं माँगा। उन्होंने प्रणाम किया और अपना मन परम लक्ष्य भगवान वासुदेव में स्थिर कर दिया। उनकी सेवा के पीछे कोई छिपी कामना नहीं थी, इसलिए संसार की माया उन्हें जागने के बाद के स्वप्न से अधिक वास्तविक नहीं लगी।
रंतिदेव का अनुसरण करने वाले लोग भी उनके उदाहरण से बदल गए। शास्त्र कहता है कि वे सभी भगवान नारायण के श्रेष्ठ भक्त बन गए।
दान के पीछे की दृष्टि
रंतिदेव की महानता केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने कितना त्याग किया। इससे भी बड़ी शिक्षा है कि उन्होंने दूसरों को किस दृष्टि से देखा।
उन्होंने सम्मानित अतिथि की सहायता करके निम्न सामाजिक स्थिति वाले लोगों से मुँह नहीं मोड़ा। अतिथि उस समय के समाज के अलग-अलग स्तरों से आए और अंत में भूखे पशु भी उनके द्वार पहुँचे। सामाजिक प्रतिष्ठा घटती गई, पर रंतिदेव का सम्मान तनिक भी कम नहीं हुआ। उन्होंने सबमें हरि को देखा।
इसलिए उनकी करुणा केवल दयालुता नहीं थी। वह व्यवहार में प्रकट हुआ अध्यात्म था।
यह कहना सुंदर है कि परमात्मा हर हृदय में निवास करते हैं। उसी विश्वास के कारण अपना अंतिम जल दे देना अनुभूति है।
रंतिदेव हमें क्या सिखाते हैं
करुणा के योग्य लोगों की श्रेणी मत बनाइए
कथा जानबूझकर रंतिदेव की करुणा का दायरा बढ़ाती है। सम्मानित अतिथि, साधारण श्रमिक, कुत्तों के साथ आया यात्री और समाज से बहिष्कृत व्यक्ति—सभी को समान पवित्र दृष्टि मिलती है।
पहचान से पहले व्यक्ति को देखिए
रंतिदेव सामाजिक लेबल देखने से पहले भूख और प्यास देखते हैं। उनकी भक्ति उन्हें दूसरे जीव की पीड़ा के प्रति अधिक सजग बनाती है।
उदारता बताती है कि हम वास्तव में किसे पूजते हैं
बहुत होने पर देना अच्छा है। किंतु जब भय कहता है, “इसे अपने लिए बचा लो,” तब भी देना हृदय के वास्तविक केंद्र को प्रकट करता है।
करुणा स्वयं मुक्ति का रूप बन सकती है
रंतिदेव संसार के दुःख से अकेले निकलना नहीं चाहते। वे जीवों से ऐसा ऐक्य चाहते हैं जिसमें दूसरों की मुक्ति अपनी मुक्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
हमारे हाथों में रखा पात्र
हममें से अधिकांश को रंतिदेव जैसी चरम परीक्षा का सामना नहीं करना पड़ेगा। कथा हमें अपने और अपने परिवार की वास्तविक जिम्मेदारियों की उपेक्षा करने के लिए भी नहीं कहती। वह एक शांत किंतु लगातार लौटने वाला प्रश्न पूछती है: जब कोई मूल्यवान वस्तु हमारे हाथों में आती है, तो क्या हम उसे केवल अपनी संपत्ति देखते हैं, या किसी की सहायता की संभावना भी?
हमारा “अंतिम पात्र” किसी अनदेखे व्यक्ति के लिए निकाला गया समय हो सकता है। बिना निर्णय किए बाँटा गया भोजन, झुँझलाहट के स्थान पर दिया गया धैर्य, अथवा वहाँ दिया गया सम्मान जहाँ समाज उसे रोक लेता है—ये सब उसी करुणा के रूप हैं।
रंतिदेव का महल खाली हो चुका था। उनके शरीर के पास देने को लगभग कुछ नहीं था। फिर भी उसी रिक्तता के द्वार पर परमात्मा बार-बार किसी दूसरे चेहरे में आते रहे।
और हर बार राजा ने द्वार खोल दिया।
शास्त्रीय आधार
यह कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम स्कंध, अध्याय 21—विशेष रूप से श्लोक 2 से 18—पर आधारित एक मौलिक साहित्यिक पुनर्कथन है। मूल घटनाक्रम को सुरक्षित रखते हुए आज के पाठकों के लिए दृश्य-वर्णन और चिंतन को नई भाषा दी गई है।
- श्रीमद्भागवत 9.21 — राजा रंतिदेव की संपूर्ण कथा
- श्रीमद्भागवत 9.21.12 — रंतिदेव की करुणामयी प्रार्थना
- श्रीमद्भागवत 9.21.15 — अतिथियों का दिव्य स्वरूप प्रकट होना
पात्र खाली हो गया, पर हृदय खाली नहीं हुआ।
रंतिदेव की कथा हमें याद दिलाए कि करुणा का प्रत्येक कार्य उन भगवान को अर्पण बन सकता है जो सभी जीवों में निवास करते हैं।
