जब सृष्टि अनन्त जल में विलीन हो गई, ऋषि मार्कण्डेय अकेले भटकते रहे। तभी उन्होंने असम्भव दृश्य देखा—एक वटपत्र पर शांत लेटा तेजस्वी शिशु, जिसकी श्वास चल रही थी जबकि पूरा ब्रह्माण्ड मिट चुका था।
मार्कण्डेय ने युगों तक तप और भक्ति की थी। प्रसन्न होकर नर-नारायण ने वर माँगने को कहा। ऋषि ने भगवान की रहस्यमयी माया देखनी चाही—वही शक्ति जिससे नित्य सत्य बदलते जगत के रूप में दिखाई देता है।
एक संध्या आश्रम में प्रचण्ड वायु चली। मेघों ने आकाश ढँक लिया और वर्षा दीवार जैसी हो गई। समुद्र महाद्वीपों के ऊपर उठे; तारे गायब हुए। मार्कण्डेय अथाह प्रलय-जल में बह गए।
मानो असंख्य वर्षों तक वे अंधकार में भटकते रहे। लहरें, भूख, भय और विशाल जलचर उन्हें सताते रहे। भूमि, दिशा, समय और साथी—जीवन नापने का हर आधार समाप्त था।
अनन्त को धारण करता पत्र
फिर जल के बीच छोटा वटवृक्ष दिखा। उसके हरे पत्र पर सुंदर श्याम शिशु कोमल प्रकाश से चमक रहा था। बालक ने कमल जैसे चरण को मुख के पास रखा और मुस्कराया।
मार्कण्डेय पास खिंचे और शिशु की एक श्वास के साथ उसके भीतर चले गए। वहाँ पूरा ब्रह्माण्ड था—पर्वत, नदियाँ, नगर, तारे, प्राणी और उनका अपना आश्रम भी। अगली श्वास के साथ वे फिर बाहर, पत्र पर बैठे बालक के सामने थे।
वे उसे आलिंगन करने दौड़े। उसी क्षण बालक, वृक्ष और प्रलय लुप्त हो गए। मार्कण्डेय फिर शांत संध्या में अपने आश्रम के पास बैठे थे।
जो जगत हमें समेटने जितना विशाल लगता है, वह स्वयं उस परम सत्ता में सहज समाया है जिसे हम सीमित नहीं कर सकते।
विस्मय ही ज्ञान
मार्कण्डेय को माया की सूखी परिभाषा नहीं मिली। उन्हें ऐसा अनुभव मिला जिसने साधारण बुद्धि का माप तोड़ दिया। जगत भगवान की अभिव्यक्ति के रूप में सत्य, पर लहर की तरह अस्थिर है। प्रभु जगत में भी हैं और उसके पार भी—शिशु जितने छोटे दिखाई देकर एक श्वास में समस्त आकाशगंगाएँ धारण करते हैं।
शास्त्रीय आधार: श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध 12, अध्याय 8–10। यह मौलिक साहित्यिक पुनर्कथन है।
