पिंगला पूरी रात किसी धनवान ग्राहक की प्रतीक्षा करती रही। कोई नहीं आया तो निराशा अप्रत्याशित गुरु बन गई—और गलत द्वार पर बाँधी आशा ने आखिर पकड़ छोड़ दी।
विदेह नगर में पिंगला सजकर घर के बाहर खड़ी हुई। प्रत्येक सम्पन्न पुरुष को देखकर सोचती कि वह कितना देगा। एक गया, फिर दूसरा। वह भीतर जाती, फिर बाहर आकर प्रतीक्षा करती।
रात गहरी हुई। हर पदचाप आशा जगाती और दूर जाता व्यक्ति उसे निराशा में गिरा देता। शरीर थक गया, पर अपेक्षा ने विश्राम नहीं करने दिया।
भीतर की ओर मोड़
अंततः निराशा ने चक्र तोड़ा। पिंगला ने देखा कि किसी राहगीर ने उसे द्वार पर नहीं बाँधा था; उसकी तृष्णा ने बाँधा था। वह हृदय में सदा रहने वाले परम मित्र को भूलकर अस्थायी लोगों से स्थायी संतोष माँग रही थी।
उसने नगर को दोष नहीं दिया। निराशा को आशीर्वाद कहा, क्योंकि उसने बेचैनी का सौदा दिखा दिया। इच्छा कहती है, “शायद अगला व्यक्ति, अगला धन या अगला सुख मुझे पूर्ण करेगा।” वैराग्य तब आरंभ होता है जब हम निरंतर “अगला” कहने की कीमत देखते हैं।
पिंगला सड़क से हटकर लेट गई और शांति से सोई। बाहर कुछ नहीं सुधरा; धन नहीं आया। परिवर्तन इतना था कि अपेक्षा अब मन की पहरेदार नहीं थी।
निराशा वह द्वार बन सकती है जिससे झूठी आशा बाहर और गहरी आशा भीतर आती है।
मुक्ति का अनुभव
भागवत पिंगला को अवधूत के गुरुओं में रखता है, क्योंकि ज्ञान किसी भी जीवन में प्रकट हो सकता है। उसका जागरण सामाजिक प्रतिष्ठा पर नहीं, ईमानदार आत्म-दर्शन पर निर्भर है। हम केवल अभाव से नहीं, उस वादे से भी दुखी होते हैं जो उससे जबरन करवाते हैं।
यह स्वस्थ लक्ष्य या संबंध छोड़ना नहीं सिखाता। यह सीमित वस्तु से अनन्त घर माँगने से सावधान करता है। जब इच्छा हर गुजरते अवसर को उद्धारकर्ता बनाना छोड़ती है, तभी कृतज्ञता और भक्ति खुलकर साँस लेती हैं।
शास्त्रीय आधार: श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध 11, अध्याय 8। यह मौलिक साहित्यिक पुनर्कथन है।
